खामोश पन्ने – Chapter 9 | झूठा पिता | Original Hindi Mystery & Emotional Novel

क्या होगा जब आपको पता चले कि जिसे आप अपना पिता समझ रहे थे... वह सिर्फ़ एक झूठ था?

खामोश पन्ने Chapter 9 – झूठा पिता में अन्वी के सामने डीएनए रिपोर्ट एक ऐसा सच खोलती है जो उसकी पूरी पहचान पर सवाल खड़ा कर देता है। 

अब सच और झूठ के बीच की दूरी पहले से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो चुकी है।

📖 पढ़िए — खामोश पन्ने Chapter 9 : झूठा पिता 

"हर रिश्ता खून से नहीं बनता... और हर खून का रिश्ता सच भी नहीं होता।"

लालटेन की पीली रोशनी...
अन्वी के काँपते चेहरे पर पड़ रही थी।

उसके होंठ अब भी थरथरा रहे थे।
"पा...पा...?"
सामने खड़ा आदमी हल्के से मुस्कुराया।

उसकी आँखों में एक अजीब-सी शांति थी।
लेकिन...
उस मुस्कान में अपनापन नहीं...
कुछ छिपा हुआ था।

"हाँ..."

उसने धीमे से कहा।
"मैं तुम्हारा पिता हूँ।"

अन्वी की आँखों से आँसू बह निकले।
बचपन से...
जिस चेहरे को देखने की इच्छा थी...
वह आज सामने खड़ा था।

लेकिन...
दिल उसे अपनाने से इंकार कर रहा था।

"अगर आप मेरे पिता हैं..."
"तो इतने साल कहाँ थे?"
आदमी कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—
"मुझे तुमसे दूर कर दिया गया था।"

"तुम्हारी माँ ने..."
"और मीरा ने..."

"झूठ!"
पीछे से वही बुज़ुर्ग महिला चीख उठीं।

"एक और झूठ मत बोलो..."

पूरा कमरा सन्नाटे में डूब गया।
आदमी ने उनकी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों की नरमी...
अचानक ग़ायब हो गई।

"तुम अब भी ज़िंदा हो..."
उसने धीमी आवाज़ में कहा।

महिला काँप उठीं।
"मैंने सोचा था...
तुम कभी वापस नहीं आओगे।"

अन्वी हैरान थी।
ये दोनों...
एक-दूसरे को पहले से जानते थे।

उसने घबराकर पूछा—
"सच कौन बोल रहा है?"

महिला ने अलमारी की ओर इशारा किया।
"ऊपर...
नीले रंग की फ़ाइल निकालो।"

अन्वी ने फ़ाइल निकाली।
उस पर धूल जमी थी।

जैसे...
उसे वर्षों से किसी ने छुआ ही न हो।
फ़ाइल खुलते ही...
उसमें एक डीएनए रिपोर्ट थी।

रिपोर्ट के ऊपर लिखा था—
"गोपनीय"
अन्वी के हाथ काँपने लगे।

उसने नीचे पढ़ा।
Father Match : 0%
उसकी साँस रुक गई।

"नहीं..."
"यह नहीं हो सकता..."
उसने काँपती नज़रों से सामने खड़े आदमी को देखा।

"तो..."
"आप..."
"मेरे पिता नहीं हैं...?"

आदमी पहली बार ज़ोर से हँसा।
उसकी हँसी पूरे कमरे में गूँज उठी।

"हाहाहा..."

"आख़िर..."
"तुम्हें सच मिल ही गया।"
उसने धीरे-धीरे लालटेन ज़मीन पर रख दी।

और...
अपनी जेब से एक पुरानी अंगूठी निकाली।
अन्वी की आँखें फैल गईं।

वही अंगूठी...
जो उसकी माँ हमेशा अपनी अलमारी में छिपाकर रखती थीं।

"ये अंगूठी..."
"आपके पास कैसे आई?"

आदमी मुस्कुराया।
"क्योंकि..."
"मैं उस रात वहाँ था।"

"कौन-सी रात?"
अन्वी ने पूछा।

उसकी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी।
अब उसमें डर से ज़्यादा...
सच जानने की ज़िद थी।

आदमी ने पहली बार अपना नाम बताया।
"मेरा नाम..."
"विक्रम है।"

"और..."

"मैं तुम्हारे पिता नहीं..."
"तुम्हारे पिता का सबसे बड़ा दुश्मन हूँ।"

कमरे में जैसे समय रुक गया।
बुज़ुर्ग महिला की आँखें बंद हो गईं।

जैसे...
उन्हें यही डर था।

विक्रम ने आगे कहा—
"तुम्हारे असली पिता..."
"ज़िंदा हैं।"
अन्वी का दिल धड़कना भूल गया।

"क्या...?"

"हाँ..."
"लेकिन..."
"अगर तुम उनसे मिली..."
"तो बहुत लोग मर जाएँगे।"

"क्यों?"
विक्रम ने धीरे से अपनी शर्ट की जेब से...
एक पुरानी फोटो निकाली।

फोटो में...
एक जवान आदमी...
गोद में छह महीने की बच्ची को लिए मुस्कुरा रहा था।

उस बच्ची के गले में...
वही चाँदी का लॉकेट था...
जो आज अन्वी के पास था।

फोटो के पीछे लिखा था—
"मेरी अन्वी के लिए...

Chapter 9 Ends... ❤️
To Be Continued... 📖

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क्या विक्रम सच बोल रहा है... या यह भी उसकी एक नई चाल है?

📖 अगला अध्याय हर शाम 7:00 PM (IST) पर Blogger पर प्रकाशित होगा।

— Written by DilSe Diaries by Pooja.K




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