खामोश पन्ने Chapter 20 – पिता का आख़िरी राज़ | Original Hindi Mystery Novel
📖 KHAMOSH PANNE
Chapter 20 – पिता का आख़िरी राज़ ❤️
"कुछ रिश्ते खून से बनते हैं... और कुछ रिश्ते उस सच से, जिसे जानकर इंसान पूरी उम्र चुप रहता है।"
कमरे में...
किसी की आवाज़ नहीं थी।
सिर्फ़ मीरा की डायरी...
अन्वी के काँपते हाथों में थी।
उसकी आँखें...
आर्यन पर टिकी थीं।
"आपने कहा था..."
अन्वी की आवाज़ टूट गई।
"कि आप मेरे पिता हैं।"
आर्यन ने सिर झुका लिया।
"हाँ।"
"तो फिर..."
उसने डायरी का पन्ना उठाया।
"माँ ने ये क्यों लिखा..."
'आर्यन को भी नहीं पता कि वह तुम्हें किससे बचा रहा था।'
आर्यन ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ सेकंड बाद...
उसने धीमे से कहा—
"क्योंकि..."
"मुझे भी पूरी सच्चाई कभी नहीं बताई गई।"
अन्वी की आँखों में आँसू आ गए।
"फिर आप जानते क्या थे?"
आर्यन ने अपनी जेब से...
एक पुराना कागज़ निकाला।
वही कागज़...
जिसके कोने पर मीरा की लिखावट थी।
उसने अन्वी के सामने रख दिया।
ऊपर लिखा था—
"अगर कभी अन्वी को सच बताना पड़े..."
नीचे...
सिर्फ़ तीन नाम थे।
मीरा।
आर्यन।
और...
समर।
अन्वी ने पूछा—
"समर का नाम क्यों है?"
आर्यन ने कहा—
"क्योंकि उस रात..."
"जब मीरा तुम्हें लेकर प्रयोगशाला से भागी थी..."
"समर भी वहीं था।"
"और उसने..."
आर्यन कुछ पल रुका।
"उसने तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं की।"
"बल्कि..."
"उसने हमें भागने में मदद की।"
अन्वी हैरान थी।
"तो फिर वो दुश्मन कैसे बन गया?"
स्क्रीन पर अचानक समर का चेहरा दिखाई दिया।
वह मुस्कुरा रहा था।
"मैं दुश्मन कभी था ही नहीं।"
अन्वी ने स्क्रीन की ओर देखा।
"तो फिर ये सब क्या है?"
समर ने जवाब दिया—
"जो तुम देख रही हो..."
"वह मेरी योजना नहीं है।"
डॉ. राघव ने तुरंत पूछा—
"तो किसकी है?"
समर कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
"उसकी..."
"जिसका नाम हमने Project A-13 से भी मिटा दिया था।"
राघव के चेहरे का रंग उड़ गया।
"नहीं..."
आर्या ने पूछा—
"कौन?"
समर ने स्क्रीन पर एक पुरानी फ़ाइल खोली।
उस पर लिखा था—
PROJECT ZERO
अन्वी ने धीरे से पढ़ा—
"Project Zero..."
समर ने कहा—
"Project A-13..."
"उससे शुरू नहीं हुआ था।"
"वह..."
"Project Zero के बाद बनाया गया था।"
आर्यन ने अचानक कहा—
"बस!"
समर की आवाज़ शांत रही।
"अब सच छिपाने का कोई मतलब नहीं है, आर्यन।"
अन्वी ने आर्यन की तरफ़ देखा।
"आप Project Zero के बारे में जानते हैं?"
आर्यन ने कोई जवाब नहीं दिया।
अन्वी की आवाज़ अब कठोर थी।
"पापा..."
"मेरी तरफ़ देखिए।"
आर्यन ने धीरे से आँखें उठाईं।
उन आँखों में...
पिता का प्यार था।
लेकिन उसके पीछे...
एक ऐसा डर था...
जिसे अन्वी ने पहले कभी नहीं देखा था।
"Project Zero में..."
आर्यन ने कहना शुरू किया।
"एक ही Subject था।"
"कौन?"
आर्यन ने काँपते हुए कहा—
"मैं।"
अन्वी के हाथ से डायरी गिरते-गिरते बची।
"आप...?"
"हाँ।"
"लेकिन क्यों?"
आर्यन ने गहरी साँस ली।
"क्योंकि उस समय..."
"मैं इंसान नहीं..."
"एक प्रयोग था।"
कमरे में...
जैसे हवा रुक गई।
डॉ. राघव ने आँखें बंद कर लीं।
"Project Zero का उद्देश्य..."
"यादों को बदलना नहीं था।"
"उसका उद्देश्य था..."
"एक ऐसा इंसान बनाना..."
"जो दूसरों की यादों को अपने भीतर सुरक्षित रख सके।"
आर्यन ने अन्वी की तरफ़ देखा।
"लेकिन प्रयोग सफल नहीं हुआ।"
"कम से कम..."
"उन्हें ऐसा लगा।"
अन्वी ने पूछा—
"फिर?"
आर्यन ने अपने सीने पर हाथ रखा।
"मेरे अंदर..."
"आज भी उन लोगों की यादें हैं।"
"हज़ारों लोगों की।"
अन्वी पीछे हट गई।
"तो..."
"आपको मेरी यादें भी पता हैं?"
आर्यन की आँखों से आँसू बह निकले।
"नहीं।"
"तुम्हारी नहीं।"
"क्योंकि..."
"तुम्हारी यादें..."
"मेरे अंदर नहीं रखी गई थीं।"
अन्वी ने पूछा—
"तो कहाँ हैं?"
आर्यन ने...
धीरे से A-14 की तरफ़ देखा।
A-14 मुस्कुरा रही थी।
"उसके अंदर?"
अन्वी ने पूछा।
आर्यन ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
"तुम्हारी यादें..."
"दो हिस्सों में बाँटी गई थीं।"
"एक हिस्सा..."
"तुम्हारे अंदर।"
"और दूसरा..."
आर्यन की आवाज़ धीमी हो गई।
"A-14 के अंदर।"
अन्वी ने A-14 की तरफ़ देखा।
दोनों की आँखें मिलीं।
अचानक...
A-14 के हाथ से डायरी गिर गई।
उसके चेहरे का रंग बदल गया।
"अन्वी..."
उसने बहुत धीमे कहा—
"मुझे सब याद आ गया।"
"क्या?"
A-14 की आँखों से आँसू बहने लगे।
"उस रात..."
"मीरा तुम्हें अकेले नहीं ले गई थी।"
"मैं भी उसके साथ थी।"
अन्वी स्तब्ध रह गई।
A-14 आगे बोली—
**"और..."
"जिसे तुम आर्या समझती रही..."
उसने अपनी ओर इशारा किया।
"वो नाम मेरा नहीं था।"
अन्वी की साँस रुक गई।
"तो तुम कौन हो?"
A-14 ने धीरे से कहा—
**"मैं..."
"आर्या की याद हूँ।"
कमरे में...
एक पल के लिए...
कोई कुछ समझ नहीं पाया।
तभी...
पूरी प्रयोगशाला की सभी स्क्रीनें एक साथ लाल हो गईं।
एक नई चेतावनी दिखाई दी—
PROJECT ZERO — MEMORY RECOVERY: 100%
समर की आवाज़ आई—
"अब आख़िरी दरवाज़ा खुलने वाला है।"
अन्वी ने पूछा—
"कौन-सा दरवाज़ा?"
समर ने उत्तर दिया—
"तुम्हारे अपने दिमाग़ का।"
और उसी पल...
अन्वी के सिर में तेज़ दर्द उठा।
उसकी आँखों के सामने...
एक के बाद एक तस्वीरें चमकने लगीं।
एक बच्ची...
एक अस्पताल...
मीरा...
आर्यन...
समर...
एक जलता हुआ कमरा...
और...
एक आदमी...
जिसका चेहरा अब भी दिखाई नहीं दे रहा था।
फिर...
उस आदमी ने झुककर छोटी-सी अन्वी के कान में कुछ कहा—
"जब तुम्हें सब याद आएगा..."
"तब तुम समझोगी..."
"कि तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाया नहीं था..."
"...उन्होंने तुम्हें छुपाया था।"
अन्वी ने चीखकर आँखें खोल दीं।
उसने आर्यन की तरफ़ देखा।
आर्यन...
सिर्फ़ उसे देख रहे थे।
कुछ बोल नहीं पा रहे थे।
अन्वी ने काँपती आवाज़ में पूछा—
"पापा..."
"आपने मुझे किससे छुपाया था?"
आर्यन की आँखों से आँसू बह निकले।
और उन्होंने पहली बार...
उस सवाल का जवाब देने के बजाय...
सिर्फ़ इतना कहा—
"जिससे तुम आज भी बच नहीं पाई हो..."
अचानक...
प्रयोगशाला की सारी लाइटें बुझ गईं।
अँधेरे में...
एक आख़िरी आवाज़ गूँजी—
"मुझे ढूँढने की ज़रूरत नहीं है, अन्वी..."
"मैं हमेशा तुम्हारे बहुत करीब था।"
लाइट वापस आई।
समर की स्क्रीन बंद थी।
लेकिन...
आर्यन के पीछे...
एक आदमी खड़ा था।
अन्वी ने उसे देखा।
उसका चेहरा...
उसे कहीं देखा हुआ लग रहा था।
बहुत पुराना...
बहुत अपना...
वह आदमी मुस्कुराया।
और बोला—
"हैलो, बेटी।"
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